स्मृति शेष-प्रभाष जोशी
प्रसन्न
प्रभाष जोशी के जाने से पत्रकारिता जगत का शीर्ष शून्य सा खाली हो गया हो गया है। उनके जाने से जो जगह खाली हुई है, उसकी भरपाई शायद ही कोई कर पाए।
मेरे आदर्श थे प्रभाष जोशी। एक गहरा रिश्ता था उनके साथ मेरा। मैं उन्हें अपना दादाजी मानता था और उन्होंने भी मुझे पोते का दर्जा दे रखा था। मैं उनसे सिर्फ 3 बार मिला, लेकिन रिश्ता ऐसा बन गया जैसे सदियों से पहचान हो। उनसे मिलना मेरे लिए सौभाग्य भी है और दुर्भाग्य भी। सौभाग्य इस संदर्भ में कि उस महापुरूष से मैं मिल सका। दुर्भाग्य इस संदर्भ में कि जब वह मुझे जानने लगे तो विधाता के क्रूर हाथों ने उन्हें छीन लिया।
6 नवंबर की सुबह जब इंस्टीट्यूट आया,मेरे एक मित्र ने कहा कि तुम्हारे दादाजी अब नहीं रहे, मैं सुनकर स्तब्ध रह गया। मुझे ऐसा लगा कि मेरे पैरो तले जमीन खिसक गई। मुझे पता था कि संस्थान के कई छात्र यह जानते है कि मैं प्रभाष जोशी को दादाजी मानता हूं, इसलिए मैंने उनकी बात सुनकर दुबारा पूछा यार सही में प्रभाष जोशी नहीं रहे ………..?
उसने सर हिलाया । मेरी आंख भर आई। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था इसलिए इंटरनेट खोलकर इस बात की पुष्टि की। पिछले 4 दिनों से मैं इस स्थिति में नहीं था कि दादाजी के बारे में कुछ लिख सकूं। मेरे साथ उनकी कुछ यादें हैं उसे मैं लिख रहा हूं--------------
दादाजी से मेरी पहली मुलाकात मेरे संस्थान(आईआईएमसी) में सत्र की शुरुआत में 29 जुलाई को हुई थी। हम सब छात्रों का मार्गदर्शन करने आएं थे वह। मैं उन्हें पहले से जानता था। उनको देखकर मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और मंच के समीप उनसे मिलने पहुंच गया। मैंने उनके चरण छुए, उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और मेरा नाम पूछा। मैंने अपना नोटबुक बढ़ाते हुए कहा दादाजी औटोग्राफ प्लीज़। उन्होंने कहा मेरा औटोग्राफ लेकर क्या करोगे ?
लोग सेलिब्रेटियों के औटोग्राफ लेते हैं। मैंने जब जिद कर दी तो उन्होंने औटोग्राफ दिया और कहा प्रसन्न हमेशा प्रसन्न रहो। इस मुलाकात को मैं कभी नहीं भूल सकता।
दादाजी से मिलने का मुझे फिर सौभाग्य प्राप्त हुआ 8अक्टूबर को जेएनयू में। जेपी की पुण्यतिथि पर एक संगोष्ठी थी। इसमें दादाजी(प्रभाष जोशी) और कुलदीप नैय्यर आए थे। उस दिन मैंने जैसे ही दादाजी के चरण छुने गया उन्होंने मुझे पहचान लिया। कहा –तुम आईआईएमसी वाले हो न...?
मुझे बेहद खुशी हुई कि इतने व्यस्त और इतने बड़े आदमी को एक मामूली सा छात्र याद है। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और पत्रकारिता के लिए कुछ ज्ञान भी दिया। उन्होंने अपना टेलिफोन नंबर भी दिया ।
दादाजी से मेरी तीसरी और अंतिम मुलाकात हुई 28 अक्टूबर को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में। चुनावों में पैसे लेकर खबर छापने वाले पेपरों के खिलाफ एक संगोष्टी थी। मैं जब वहां गया तब मुझे बहुत खुशी हुई कि प्रभाष जोशी यहां आएं है। मैं वहां भी उनसे मिलने गया। उनसे आशीर्वाद लिया। वह मुझे पहचान गए, पूछा कैसे हो बेटा ?...................
फिर मैंने कहा दादाजी आपने जो नंबर दिया है, उस पर आपसे बात नहीं हो पाती है। इस पर उन्होंने फिर नंबर दिया और कहा अब मुझे तुम्हारा नाम(प्रसन्न) याद हो गया है। तुम जब भी फोन करोगे आसानी से बात हो जाएगी। मैं जब भी इस क्षण को याद करता हूं मैं अपने आंसू नहीं रोक पा रहा हूं। दादाजी मेरा नाम याद कर,अपना नंबर देकर वहां चले गए जहां उनसे बात करने के लिए कोई नंबर नहीं है।
दादाजी जब आपको जाना ही था तो आपने अपना नंबर क्यों दिया मुझे........................................
मैं अब उस नंबर का क्या करुंगा ?..............................
किससे बात करुंगा ?.................................
मेरा दिल अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि दादाजी नहीं रहे।
भगवान दादाजी(प्रभाष जोशी) की आत्मा को शांति दे।