गुरुवार, 26 नवंबर 2009

आईआईएमसी की सैर


चलों आप सैर करे ऐसे संस्थान की जहां कलम के जादूगर अर्थात पत्रकार तैयार होते हैं


डीयू


आज देखिएं डीयू और जेएनयू को



चलो मैं आज आपको ले चलता हूं शिक्षा के मंदिर जेएनयू और डीयू में




पीएम ने धमकाया पाक को



प्रसन्न, आईआईएमसी

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका दौरे पर गए हैं। वहां उन्होंने बराक ओबामा से आतंकवाद पर लम्बी बातचीत की। पीएम ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि वह मुंबई हमले में शामिल आतंकियों के खिलाफ जल्द से जल्द सख्त कार्रवाई करें। भारत अब तब तक चैन से नहीं बैठने वाला नहीं है, जब तक पाक उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगा।

पीएम ने इस तरह से बयान देकर पाक के भीतर डर पैदा किया है। यह बहुत जरुरी था।
पाक के खिलाफ पहले भारत का ढुलमुल रवैया रहता था, फलस्वरूप हमने कई आतंकी हमलों को झेला है।
पाक ने इस बयान के बाद मुंबई हमले में शामिल आतंकी जकीउर रहमान लखवी समेत 7 आतंकी के खिलाफ चार्जशीट दायर की है।
इस घटना से सरकार को सीख लेनी चाहिए और आगे से पाक के खिलाफ सख्त रवैया अपनाएं।

हो जाओं पाकिस्तान अब हम बर्दाश्त नहीं करनेवाले हैं

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

स्मृति शेष-प्रभाष जोशी

प्रसन्न

प्रभाष जोशी के जाने से पत्रकारिता जगत का शीर्ष शून्य सा खाली हो गया हो गया है। उनके जाने से जो जगह खाली हुई है, उसकी भरपाई शायद ही कोई कर पाए।
मेरे आदर्श थे प्रभाष जोशी। एक गहरा रिश्ता था उनके साथ मेरा। मैं उन्हें अपना दादाजी मानता था और उन्होंने भी मुझे पोते का दर्जा दे रखा था। मैं उनसे सिर्फ 3 बार मिला, लेकिन रिश्ता ऐसा बन गया जैसे सदियों से पहचान हो। उनसे मिलना मेरे लिए सौभाग्य भी है और दुर्भाग्य भी। सौभाग्य इस संदर्भ में कि उस महापुरूष से मैं मिल सका। दुर्भाग्य इस संदर्भ में कि जब वह मुझे जानने लगे तो विधाता के क्रूर हाथों ने उन्हें छीन लिया।
6 नवंबर की सुबह जब इंस्टीट्यूट आया,मेरे एक मित्र ने कहा कि तुम्हारे दादाजी अब नहीं रहे, मैं सुनकर स्तब्ध रह गया। मुझे ऐसा लगा कि मेरे पैरो तले जमीन खिसक गई। मुझे पता था कि संस्थान के कई छात्र यह जानते है कि मैं प्रभाष जोशी को दादाजी मानता हूं, इसलिए मैंने उनकी बात सुनकर दुबारा पूछा यार सही में प्रभाष जोशी नहीं रहे ………..?
उसने सर हिलाया । मेरी आंख भर आई। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था इसलिए इंटरनेट खोलकर इस बात की पुष्टि की। पिछले 4 दिनों से मैं इस स्थिति में नहीं था कि दादाजी के बारे में कुछ लिख सकूं। मेरे साथ उनकी कुछ यादें हैं उसे मैं लिख रहा हूं--------------
दादाजी से मेरी पहली मुलाकात मेरे संस्थान(आईआईएमसी) में सत्र की शुरुआत में 29 जुलाई को हुई थी। हम सब छात्रों का मार्गदर्शन करने आएं थे वह। मैं उन्हें पहले से जानता था। उनको देखकर मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और मंच के समीप उनसे मिलने पहुंच गया। मैंने उनके चरण छुए, उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और मेरा नाम पूछा। मैंने अपना नोटबुक बढ़ाते हुए कहा दादाजी औटोग्राफ प्लीज़। उन्होंने कहा मेरा औटोग्राफ लेकर क्या करोगे ?
लोग सेलिब्रेटियों के औटोग्राफ लेते हैं। मैंने जब जिद कर दी तो उन्होंने औटोग्राफ दिया और कहा प्रसन्न हमेशा प्रसन्न रहो। इस मुलाकात को मैं कभी नहीं भूल सकता।
दादाजी से मिलने का मुझे फिर सौभाग्य प्राप्त हुआ 8अक्टूबर को जेएनयू में। जेपी की पुण्यतिथि पर एक संगोष्ठी थी। इसमें दादाजी(प्रभाष जोशी) और कुलदीप नैय्यर आए थे। उस दिन मैंने जैसे ही दादाजी के चरण छुने गया उन्होंने मुझे पहचान लिया। कहा –तुम आईआईएमसी वाले हो न...?
मुझे बेहद खुशी हुई कि इतने व्यस्त और इतने बड़े आदमी को एक मामूली सा छात्र याद है। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और पत्रकारिता के लिए कुछ ज्ञान भी दिया। उन्होंने अपना टेलिफोन नंबर भी दिया ।
दादाजी से मेरी तीसरी और अंतिम मुलाकात हुई 28 अक्टूबर को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में। चुनावों में पैसे लेकर खबर छापने वाले पेपरों के खिलाफ एक संगोष्टी थी। मैं जब वहां गया तब मुझे बहुत खुशी हुई कि प्रभाष जोशी यहां आएं है। मैं वहां भी उनसे मिलने गया। उनसे आशीर्वाद लिया। वह मुझे पहचान गए, पूछा कैसे हो बेटा ?...................
फिर मैंने कहा दादाजी आपने जो नंबर दिया है, उस पर आपसे बात नहीं हो पाती है। इस पर उन्होंने फिर नंबर दिया और कहा अब मुझे तुम्हारा नाम(प्रसन्न) याद हो गया है। तुम जब भी फोन करोगे आसानी से बात हो जाएगी। मैं जब भी इस क्षण को याद करता हूं मैं अपने आंसू नहीं रोक पा रहा हूं। दादाजी मेरा नाम याद कर,अपना नंबर देकर वहां चले गए जहां उनसे बात करने के लिए कोई नंबर नहीं है।
दादाजी जब आपको जाना ही था तो आपने अपना नंबर क्यों दिया मुझे........................................
मैं अब उस नंबर का क्या करुंगा ?..............................
किससे बात करुंगा ?.................................
मेरा दिल अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि दादाजी नहीं रहे।


भगवान दादाजी(प्रभाष जोशी) की आत्मा को शांति दे।

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

टीटी मालामाल यात्री बेहाल

फेस्टिवल सीजन और छुट्टियों के समय बढ़ जाती है टीटीयों की मनमानी। खासकर यूपी, बिहार और बंगाल की तरफ जाने वाली ट्रेनों में टीटी जमकर मनमानी करते हैं। ट्रेन के यात्रियों को परेशान करना, उनसे अवैध वसूली, सीटों को बेचना और यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार करना ही इनका मुख्य काम लगता है।
नई दिल्ली से पटना(इस्लामपुर)जानेवाली मगध एक्सप्रेस में 13 अक्टूबर की रात इस तरह की कई घटनाएं हुई। एक तो ट्रेन अपने नियत समय (रात्री 8बजे) से 4घंटे लेट खुली उपर से टीटी का दुर्व्यवहार। सफर करने वाले यात्रियों की यात्रा कितनी मुश्किल हुई उसका वर्णन मुश्किल है। ट्रेन खुलते ही टीटी ने आरक्षित बोगियों के अन्दर खाली सीटों की खरीद-बिक्री शुरू कर दी। बिक्री भी एक नई पॉलिसी के तहत। सीट को मनमानी कीमतों में घंटों के हिसाब से। टीटी एक सीट को 200-400 रुपए में 4से5 घंटे के लिए एक पैसेंजर को बेच रहे थे। फिर अगले 4-5 घंटे के लिए किसी और से। जिन पैसेंजर का टिकट वेटिंग 3-4 पर लटका हुआ था उनको सीट नहीं दे रहे थे। लेकिन अन्य वेटिंग लिस्ट और सामान्य टिकट वाले को वही सीट 300-400 रूपए में धरल्ले से बेच रहे थे। हद तो तब हो गई जब टीटी ने वेटिंग टिकट वाले एक फैमिली को सीट से उठाकर उस सीट को बेच दी। वो भी सामान्य टिकट वाले एक व्यक्ति को। इस पर जब उस परिवार की महिला सदस्या ने विरोध जताया तो टीटी अपने पद का रौब जमाने लगा। महिला ने जब कहा कि मैं रेलवे में कम्पलेन दर्ज कराउंगी टीटी ने गाली देते हुए कहा जा तुझे जो करना हो कर ले किसी का बाप मेरा कु्छ नहीं बिगार सकता है। अन्तत: बेचारी फैमिली फर्श पर बैठ गई। उस कम्पार्टमेंट के सभी यात्री इसे देखते रहे, लेकिन ने कुछ नहीं किया।
सीटों की खरीद-बिक्री की घटना सिर्फ 13 अक्टूबर को पटना जाने वाली मगध एक्सप्रेस की ही नहीं है। 18 अक्टूबर को गोरखपुर से हटिया जा रही मौर्य एक्सप्रेस में, 19 अक्टूबर को काठगोदाम से हावड़ा जा रही बाघ एक्सप्रेस में, 20 अक्टूबर को सियालदह से बलिया जा रही बलिया-सियालदह एक्सप्रेस में, 22 अक्टूबर को सियालदह से दरभंगा जा रही गंगासागर एक्सप्रेस में और 26 अक्टूबर को पटना से नई दिल्ली आ रही मगध एक्सप्रेस में भी हुई। गवाह मैं खुद हूं।
यूपी, बिहार और बंगाल जानेवाली शायद ही कोई ट्रेन टीटीयों की मनमानी से बच पाता है। आरक्षित बोगियों के यात्रियों का ऐसा हाल होता है। तो सोचा ही जा सकता है कि सामान्य दर्जे के बोगियों में यात्रियों के साथ क्या होता होगा। सामान्य डब्बे में अधिकांश गरीब और मजदूर यात्रा करते हैं। उनके साथ टीटी खूब मनमानी करते हैं। उनके सही टिकट को गलत बताकर उनसे अवैध वसूली करते हैं। कभी-कभी उनके टिकट को फाड़ भी देते हैं। सही टिकट रहने पर भी उनसे कहते हैं कि कमा कर लौटे हो कुछ देते जाओं। मजबूरन देना पड़ता है। अगर वे स्वेच्छा से नहीं देते है, तो टीटी रौब जमाकर कभी- कभी उनसे पैसे छीन भी लेते हैं।
टीटीयों के इस तरह के व्यवहार से यात्री परेशान हैं। इस पर यात्री भी सहमत हैं। दानापुर निवासी इन्दु गुप्ता ने कहा-क्या करें, कहां जाएं, टीटीयों के खिलाफ रेलवे में कमप्लेन करने पर भी इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। दिल्ली में रहनेवाले पटना के 60वर्षीय रमेश शर्मा ने कहा-रेलवे में सब मिले हुए है, मैं कई वर्षों से छुट्टियों में घर आता हूं। ट्रेन में एसा ही नजारा देखता हूं।
वहीं साधारन दर्जे के टिकट पर टीटी को पैसे देकर स्लीपर में यात्रा कर रहा एक युवक ने कहा मुझे टीटीयों के इस व्यवहार से कोई दिक्कत नहीं है, भ्रष्टाचार हर जगह है। सब टीटी थोड़े ही ऐसा है। टीटी का भी अपना तर्क है, एक टीटी ने कहा हम पैसा लेते हैं तो क्या गलत है, हम सीट तो उपलब्ध करा देते हैं।
टीटीयों के व्यवहार पर कलकत्ता से बरौनी लौट रहा शंभू महतो ने कहा हर साल होली-दिवाली में घर लौटते वक्त टीटीयों को कुछ न कुछ चढ़ावा देना ही पड़ता है। हालांकि टीटीयों को इस बात के लिए वह कोस भी रहा था।
टीटीयों ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया है। रेलवे प्रशासन कान में तेल डाले सो रही है। पता नहीं वह कुंभकरण की निंद से कब जागेगी और इनके खिलाफ कार्रवाई करेगी।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

माँ तेरी याद बहुत आती है





माँ तेरी याद बहुत आती है
जब सुबह जागता हूँ मैं,तू याद आती है
कितने प्यार से जगती थी तुम, लेकिन यहाँ कोई नहीं है
जब मै कॉलेज जाता हुँ मुझे लगता है पीछे तुम खड़ी होगी
लेकिन तुम नहीं होती
माँ तेरी याद बहुत आती है


लंच के समय जब कैंटीन में जाता हूँ
स्कूल के दिनों का टिफिन याद आता है
कितने प्यार से देती थी तुम
और मै कितने नखरे करता था
लेकिन यहाँ कोई टिफिन नहीं देता है
जो मिलता है वही खा लेता हूँ
माँ तेरी याद बहुत आती है।

जब शाम को थक कर आता हूँ
कमरे में खुद को अकेला पाता हूँ
कभी रात में खाना खाता हूँ
कभी बिन खाए सो जाता हूँ
माँ जब मैं अकेला होता हूँ
मुझे रोना आ जाता ह
कभी रहा नहीं मैं तेरे बिन
अब हर पल रहता हूँ तेरे बिन
माँ तेरी याद बहुत आती है।

जब मैं बीमार होता हूँ
कोई देखने वाला नहीं होता
रोता हूँ,तड़पता हूँ
खुद से दवा खाता हूं
माँ तेरी याद बहुत आती है।

जब बात करता हूं,फोन पर तुमसे
उसके घंटों बाद तक रोता हूं
माँ क्यों भेजी तुम इतना दूर
मुझसे रहा नहीं जाता है
माँ तेरी याद बहुत आती है।


माँ तुमने जो दी है शिक्षा
वो हर पल आते है काम
गलत आदतों से मुझे बचाता
सही रास्ते की प्रेरणा देता
माँ मुझसे दूर हो तुम
पर दिल के सबसे करीब हो तुम
माँ तेरी याद बहुत आती है।