रविवार, 30 जनवरी 2011

राज मंदिर. वाकई में शानदार है..........


12 साल बाद सिनेमा हॉल गया वाकई में अलग ही दुनिया है सिनेमा हॉल का । जब सेवेंथ में पढता था तब लास्ट टाइम सिनेमा हॉल गया था उसके बाद इसलिए नहीं गया क्युकी मुझे लगता था हॉल जाना अच्छी बात नहीं है और इससे पढई पर एफ्फेक्ट पड़ेगा । खैर पढाई को पुरे मन से किया और पोस्ट ग्रेजुएसन भी हो गया । छोटे से गाँव से दिल्ली आ गया लेकिन कभी भी नहीं गया । कई बार ऑफर मिला कभी भैया ने ऑफर दिया कभी दोस्तों ने लेकिन कभी भी नहीं गया । कभी जाने का मन भी नहीं हुआ और जरुरत भी महसूस नहीं हुयी लेकिन अब जब जॉब ज्वाइन कर लिया तब तनाव कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है फिर भी कभी नहीं सोचा की सिनेमा हॉल जाना चाहिए । पिछले हफ्ते दिल्ली गया तो ऑफर मिला पि वी आर चलने का जाने का मन भी हो गया लेकिन नहीं जा सका । दोस्त हमेशा गली देते थे क्युकी मै उनके साथ नहीं जाता था । जयपुर आये ४ महिना हो गए तब से मेरे सरे दोस्त और भैया बोलते थे जाओ राज मंदिर जा के देखो लेकिन कभी नहीं गया सोचता था अकेले क्यों जाऊ । कल अचानक से भैया के एक दोस्त आये और बोले चलोगे राज मंदिर मेरा भी ऑफ था और रूम पे खली बैठा था हां बोल दिया कल ये नहीं सोचा की जाना चाहिए या नहीं एकदम से बोल दिया हा चलिए । शो का टाइम घर पे हो गया था फिर भी निकल गया ये सोचकर की देर से भी पहुचुन्गा तो कोई बात नहीं है मुझे तो राज मंदिर देखना है। १५मिनट लेट पंहुचा बुत वाकई में बहुत मज़ा आया
राज मंदिर की जितनी तारीफ़ सुना था सब छोटा साबित हुआ
दूसरी बात पहली बार इतने बड़े परदे पे फिल्म देखने में भी मज़ा आया । सोचता हु तो लगता है एक छोटे से गाँव के सिनेमा हॉल से सीधे राज मंदिर का सफ़र वाकई में बड़ा मज़ेदार रहा....
अब तो सोचता हु वीकेंड और ऑफिस के तनाव को निकलने हर हफ्ते चला जाऊ
खैर देखा जायेगा ............................

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

ab hotel ka kitchen v hua live


12 april2010 ko nai dunia newspaper me chhapi huyi meri story

गुरुवार, 25 मार्च 2010


आज आईआईएमसी में हमारा अंतिम क्लास थी। आज इक्जाम खत्म हो गए और इसी के साथ हमारा क्लास भी खत्म हो गया। 8 महीने पहले 27 जुलाई को यहां आया था । समय कब बीत गया पता ही नहीं चला । यहां पर कुछ पाया है मैंने, लेकिन बहुत कुछ नहीं पाया। खैर सफर ठीक ठाक ही रहा। अब आगे क्या होगा पता नहीं।

बुधवार, 17 मार्च 2010

नदी की धारा है जिन्दगी


आजकल दिल उदास है,

अपनी काबिलियत पर भी संदेह होने लगा है

फिर मन में यही खयाल आता है मैं सबकुछ कर सकता हू

फिर दिल को तसल्ली देने के लिए सोचता हू कि जरुर कुछ अच्छा होने वाला है इसलिए समय लग रहा है.

बचपन से अभी तक कभी किसी चीज के लिए सब्र नहीं करना पड़ा है, इसलिए तनाव हो रहा है , लेकिन मैं इसे अपने उपर हावी नहीं होने दूंगा।

कहा भी गया है सब्र का फल मीठा होता है,

लेकिन पता नहीं मेरे सब्र करने का फल कितना मीठा होगा

फिर यही सोचता हू कि अगर आईआईएमसी में नहीं होता तो कहां होता


खैर मेरा अभी क्या होगा पता नहीं, लेकिन मुझे पता है कि मेरा भविष्य बहुत अच्छा होगा


जिन्दगी के कई रंग है, उन्हीं का सामना कर रहा हू, उतार चढ़ाव की शुरुआत हो चुकी है

नदी की धारा की तरह हो गई है जिन्दगी कहीं सीधा तो कहीं टेढ़ा

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

होली की शुभकामना


होली की हार्दिक शुभकामनाएं

जिन्दगी बहुत कुछ सिखाती है.............


अजीब दास्ता है यहां। जिन्दगी बहुत कुछ सिखाती है और बहुत कुछ बताती है। हमें पत्रकारिता में ईथिक्स- ईथिक्स रटाया जाता है, लेकिन मार्केट में ऐसे लोग होते है जो सिर्फ अपने फायदे देखते है और उसके लिए कुछ भी कर सकते है। आज कुछ ऐसा ही हुआ आईआईएमसी में बिग एफ वाले टेस्ट लेने के लिए आए, लगभग 100 कैंडि़डेट हो गए टेस्ट देने वाले। हिन्दी के सबसे ज्यादा थे, इससे शायद आऱटीवी के निदेशक डर गए और उन्होने स्क्रिप्ट टेस्ट को इंटरव्यू में बदल दिया, क्योंकि उन्हें डर था कि स्क्रिप्ट लेखन में हिन्दी वाले ज्यादा अच्छे है . ऐसा ही हुआ । हिन्दी वालो से इंटरव्यू में उन्होंने किसी से कुछ भी नहीं पुछा बस नाम- पता तक ही सीमित रहा,ऐसा लग रहा था मानो रस्म अदायगी का काम कर रहे है। यह साफ नजर आ रहा थि कि वो हिन्दी वाले किसी को लेने ही नहीं आएं है। पता लगा जिन्दगी बहुत कुछ सिखाती है...

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

संभल जाओ दोस्तों , क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है।


इतना सन्नाटा क्यों है भाई , शोले फिल्म का ये डॉयलाग आईआईएमसी में हिन्दी जर्नलिज्म के छात्रों के बीच के माहौल को बयां कर रहा था। लोगों के चेहरों पर हंसी तो थी मगर उस हंसी के पीछे छुपे गम को भी साफ देखा जा सकता था। क्लास से लेकर कैंटीन और लैब से लेकर जावेद की दुकान तक ,हर तरफ हवा में ख़ामोशी थी। ग्रुप मेल पर ब्रेकिंग न्यूज की तरह दिखने वाली सूचना को पढ़कर लोग फेसबुक और ऑरकुट का रास्ता भूल गए थे। वहीं बज़ की जगह लोगों के कान बज रहे थे। ग्रुप मेल पर आया संदेश अपने वॉयस ओवर में कह रहा था कि पीटीआई में चार का सलेक्शन,पीटीआई में चार का सलेक्शन । अब सिलसिला शुरू हो रहा था अपने सफल साथियों को बेमन से बधाई देने का । जो लोग आमने-सामने मिलकर बधाई नहीं देना चाहते थे तो उन्होंनें कम्पूयटर के की-बोर्ड पर उंगलियाँ खड़पड़ायी और ग्रुप मेल के माथे पर दे मारा बधाई हो । कुछ लोगों के चेहरे देखकर थ्री इडियट फिल्म का वो डायलॉग याद आ रहा था जिसमें हीरों कहता है कि अगर दोस्त फेल हो जाए तो दुख होता है लेकिन अगर टॉप कर जाए तो उससे भी ज्यादा दुख होता है। बहरहाल कैंपस में नजारें कुछ और भी थे । लोग ये भी कहते मिलें और अपने आप को कोस रहे थे कि काश कॉनवेंट स्कूल में पढ़े होते तो ये हाल न होता । एक तो नौकरी नहीं है ओर दूसरा नौकरी है तो पैसा नहीं। कुछ लोगों को इस बात का मलाल था कि उन्होनें पहली वरीयता पीटीआई को क्यों दी थी। करम फूटे पीटीआई के उन्होनें हमें नहीं चुना। हमेशा सज-धज के एकदम चकाचक निकलने वाले साहब का आज सिलवटों भरा कुर्ता मन कि निराशा को पढने के लिए काफी था .केन्टीन को चलने वाले महिपाल के सामने आज यक्ष प्रश्न ये था कि एच.जे वाले आज खाना क्यों नहीं खा रहे हैं ओर तिस पर से उधारी मांगने पर ये नाराजगी क्यों है . आज क्लास के ज्योतिषों कि पों -बारह थी वे हाथ कि रेखाओं को पढ़कर आने वाले प्लेसमेंट कि दशा ओर दिशा बता रहे थे .साथ ही कुछ लोगों का ये कहना कि हमने तो जानबूझकर उत्तर गलत लिखे थे ताकि इलेक्ट्रानिक मीडिया का गन माइक हमारे हाथ में आ सके ओर कह सकें कि मै 10 जनपथ से ...........। उतरे हुए चेहरों कि कतार यहीं नहीं थमती है दोस्तों कारवां अभी लम्बा है .गाहे बगाहे शायरियों से ग्रुप मेल पर जबाव देने वाले साहब भी आज बिन जबाव दिए लैब से चलते बने . जाने कि वजह पूछी तो कहने लगे कि यार आज तबियत कुछ ठीक नहीं है . आज कई प्रतिमान टूट रहे थे तो कई लोगों कि आस्था डगमगा रही थी कल तक जो किसी विशेष माध्यम में ही आपने को उपयुक्त मानते थे आज वे कहीं भी काम करने को तैयार हैं , 5 मिलें या 8 भाई हम तो चले जायेंगे . हालात ये थे कि लोग इंड़िया न्यूज को इंड़िया टीवी समझ रहे थे, अच्छा हुआ बात एनडीटीवी तक नहीं पहुँची। शाम ढलते-ढलते माहौल और ज्यादा उदासीन हो चला था क्लास में गहरी ख़ामोशी थी और सीट परे बिखरे अंग्रेजी अखबार के पन्ने अपनी अहमियत की कहानी खूब कह रहे थे- संभल जाओ दोस्तों , क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है।