मंगलवार, 3 नवंबर 2009

टीटी मालामाल यात्री बेहाल

फेस्टिवल सीजन और छुट्टियों के समय बढ़ जाती है टीटीयों की मनमानी। खासकर यूपी, बिहार और बंगाल की तरफ जाने वाली ट्रेनों में टीटी जमकर मनमानी करते हैं। ट्रेन के यात्रियों को परेशान करना, उनसे अवैध वसूली, सीटों को बेचना और यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार करना ही इनका मुख्य काम लगता है।
नई दिल्ली से पटना(इस्लामपुर)जानेवाली मगध एक्सप्रेस में 13 अक्टूबर की रात इस तरह की कई घटनाएं हुई। एक तो ट्रेन अपने नियत समय (रात्री 8बजे) से 4घंटे लेट खुली उपर से टीटी का दुर्व्यवहार। सफर करने वाले यात्रियों की यात्रा कितनी मुश्किल हुई उसका वर्णन मुश्किल है। ट्रेन खुलते ही टीटी ने आरक्षित बोगियों के अन्दर खाली सीटों की खरीद-बिक्री शुरू कर दी। बिक्री भी एक नई पॉलिसी के तहत। सीट को मनमानी कीमतों में घंटों के हिसाब से। टीटी एक सीट को 200-400 रुपए में 4से5 घंटे के लिए एक पैसेंजर को बेच रहे थे। फिर अगले 4-5 घंटे के लिए किसी और से। जिन पैसेंजर का टिकट वेटिंग 3-4 पर लटका हुआ था उनको सीट नहीं दे रहे थे। लेकिन अन्य वेटिंग लिस्ट और सामान्य टिकट वाले को वही सीट 300-400 रूपए में धरल्ले से बेच रहे थे। हद तो तब हो गई जब टीटी ने वेटिंग टिकट वाले एक फैमिली को सीट से उठाकर उस सीट को बेच दी। वो भी सामान्य टिकट वाले एक व्यक्ति को। इस पर जब उस परिवार की महिला सदस्या ने विरोध जताया तो टीटी अपने पद का रौब जमाने लगा। महिला ने जब कहा कि मैं रेलवे में कम्पलेन दर्ज कराउंगी टीटी ने गाली देते हुए कहा जा तुझे जो करना हो कर ले किसी का बाप मेरा कु्छ नहीं बिगार सकता है। अन्तत: बेचारी फैमिली फर्श पर बैठ गई। उस कम्पार्टमेंट के सभी यात्री इसे देखते रहे, लेकिन ने कुछ नहीं किया।
सीटों की खरीद-बिक्री की घटना सिर्फ 13 अक्टूबर को पटना जाने वाली मगध एक्सप्रेस की ही नहीं है। 18 अक्टूबर को गोरखपुर से हटिया जा रही मौर्य एक्सप्रेस में, 19 अक्टूबर को काठगोदाम से हावड़ा जा रही बाघ एक्सप्रेस में, 20 अक्टूबर को सियालदह से बलिया जा रही बलिया-सियालदह एक्सप्रेस में, 22 अक्टूबर को सियालदह से दरभंगा जा रही गंगासागर एक्सप्रेस में और 26 अक्टूबर को पटना से नई दिल्ली आ रही मगध एक्सप्रेस में भी हुई। गवाह मैं खुद हूं।
यूपी, बिहार और बंगाल जानेवाली शायद ही कोई ट्रेन टीटीयों की मनमानी से बच पाता है। आरक्षित बोगियों के यात्रियों का ऐसा हाल होता है। तो सोचा ही जा सकता है कि सामान्य दर्जे के बोगियों में यात्रियों के साथ क्या होता होगा। सामान्य डब्बे में अधिकांश गरीब और मजदूर यात्रा करते हैं। उनके साथ टीटी खूब मनमानी करते हैं। उनके सही टिकट को गलत बताकर उनसे अवैध वसूली करते हैं। कभी-कभी उनके टिकट को फाड़ भी देते हैं। सही टिकट रहने पर भी उनसे कहते हैं कि कमा कर लौटे हो कुछ देते जाओं। मजबूरन देना पड़ता है। अगर वे स्वेच्छा से नहीं देते है, तो टीटी रौब जमाकर कभी- कभी उनसे पैसे छीन भी लेते हैं।
टीटीयों के इस तरह के व्यवहार से यात्री परेशान हैं। इस पर यात्री भी सहमत हैं। दानापुर निवासी इन्दु गुप्ता ने कहा-क्या करें, कहां जाएं, टीटीयों के खिलाफ रेलवे में कमप्लेन करने पर भी इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। दिल्ली में रहनेवाले पटना के 60वर्षीय रमेश शर्मा ने कहा-रेलवे में सब मिले हुए है, मैं कई वर्षों से छुट्टियों में घर आता हूं। ट्रेन में एसा ही नजारा देखता हूं।
वहीं साधारन दर्जे के टिकट पर टीटी को पैसे देकर स्लीपर में यात्रा कर रहा एक युवक ने कहा मुझे टीटीयों के इस व्यवहार से कोई दिक्कत नहीं है, भ्रष्टाचार हर जगह है। सब टीटी थोड़े ही ऐसा है। टीटी का भी अपना तर्क है, एक टीटी ने कहा हम पैसा लेते हैं तो क्या गलत है, हम सीट तो उपलब्ध करा देते हैं।
टीटीयों के व्यवहार पर कलकत्ता से बरौनी लौट रहा शंभू महतो ने कहा हर साल होली-दिवाली में घर लौटते वक्त टीटीयों को कुछ न कुछ चढ़ावा देना ही पड़ता है। हालांकि टीटीयों को इस बात के लिए वह कोस भी रहा था।
टीटीयों ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया है। रेलवे प्रशासन कान में तेल डाले सो रही है। पता नहीं वह कुंभकरण की निंद से कब जागेगी और इनके खिलाफ कार्रवाई करेगी।

3 टिप्‍पणियां:

  1. लिखते रहें
    साहित्य के लिए मेरे ब्लोग पर पधारें ।

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  2. हिंदी ब्लॉग लेखन के लिए स्वागत और शुभकामनायें
    कृपया अन्य ब्लॉगों पर भी जाएँ और अपने सुन्दर
    विचारों से अवगत कराएँ

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